An exploration of the Ishavasya Upanishad opening shloka on why our exhaustion is merely the forgetting of our intrinsic completeness.
ईशावास्योपनिषद परंपरा (शान्ति मन्त्र)
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
(Om Purnamadah Purnamidam Purnat Purnamudachyate.
Purnasya Purnamadaya Purnamevavashishyate.
Om Shanti Shanti Shanti.)
- पूर्णमदः (Purnamadah): वह (अदृश्य परमात्मा / Supreme Consciousness) अपने आप में पूर्ण है।
- पूर्णमिदं (Purnamidam): यह (दिखाई देने वाला भौतिक संसार / Universe) भी पूर्ण है।
- पूर्णात् पूर्णमुदच्यते (Purnat Purnamudachyate): उस पूर्ण परमात्मा से ही यह पूर्ण जगत प्रकट (उत्पन्न) हुआ है।
- पूर्णस्य पूर्णमादाय (Purnasya Purnamadaya): उस पूर्ण में से यदि पूर्ण को निकाल (अलग कर) भी दिया जाए।
- पूर्णमेवावशिष्यते (Purnamevavashishyate): तब भी जो शेष (remaining) बचता है, वह पूर्ण ही रहता है।
अर्थ: असीम ऊर्जा का नियम (The Law of Infinite Energy)
परमात्मा या यह ब्रह्मांड एक अनंत ऊर्जा का महासागर है। उस अनंत में से कितना भी निर्माण हो जाए या कुछ भी घट जाए, उसकी पूर्णता (Wholeness) में कोई कमी नहीं आती। गणित के अनंत (Infinity) की तरह, अनंत में से अनंत निकालने पर भी अनंत ही शेष रहता है।
आंतरिक पूर्णता का संदेश (Message of Inner Completeness)
हमारे भीतर मौजूद आत्मा (Soul) उसी पूर्ण का अंश है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि हम पहले से ही भीतर से पूरे हैं। अपनी पूर्णता को महसूस करने के लिए हमें बाहरी चीज़ों, भौतिक सफलता या अन्य स्थितियों पर निर्भर होने की ज़रूरत नहीं है। हमारी थकान (exhaustion) केवल अपनी इस आंतरिक पूर्णता को भूल जाने का परिणाम है।
मानसिक शांति का सूत्र (Formula for Mental Peace)
जीवन में कुछ हासिल हो जाने या कुछ छिन जाने पर भी हमारी आत्मा का मूल स्वभाव कभी कम नहीं होता—वह हमेशा परिपूर्ण (Complete) और शांत रहता है। जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, तो मन स्वतः ही शांत होने लगता है।
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